23 जुलाई 2011
सीएनबीसी आवाज़
सीएनबीसी आवाज़
टैक्स गुरू सुभाष लखोटिया बता रहे हैं किस तरह भरे इनकम टैक्स रिटर्न और कैसे बचाएं टैक्स।
सवाल: मेरी सैलरी 2.6 लाख रुपये सालाना है। कंपनी में पैन कार्ड नहीं जमा कराने पर सैलरी का 20 फीसदी हिस्सा टैक्स के तौर पर काट लिया गया। वहीं पिछले साल कंपनी ने कोई टैक्स नहीं काटा था। क्या पैन कार्ड जमा नहीं करने पर टैक्स कटता है ?
सुभाष लखोटिया: कंपनी से टीडीएस काटा जाना चाहिए, यदि कपंनी ने ज्यादा टैक्स काटा है तो इसके बारे में कंपनी को बताएं। वहीं पैन नंबर देखकर खुद रिटर्न फाइल करना ज्यादा बेहतर होता है। इसके अलावा काटे गए टैक्स रिफंड के लिए क्लेम कर सकते हैं। नई कंपनी में नियुक्ति होने पर हमेशा कंपनी को पैन कार्ड की कॉपी मुहैया कराएं।
सवाल: मुझे बैंक एफडी से इनकम होती है। किस आईटीआर फार्म में इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करना चाहिए ?
सुभाष लखोटिया: बैंक में जमा एफडी से मिलने वाला ब्याज से आय होती है और इसके अलावा आय का कोई दूसरा स्त्रोत नहीं है तो आईटीआईआर फार्म-1 भरना चाहिए। वहीं बैंक के ब्याज से मिलने वाली आय यदि छूट सीमा से कम है तो फार्म 15जी बैंक में जमा करें जिससे टीडीएस नहीं कटेगा।
सवाल: मैं पिछले 18 साल से मस्कट में रह रहा हूं। ऑनलाइन आईटीआर फार्म-2 का रिटर्न कैसे भर सकते हैं। साथ मेरा डिजिटल सिग्नेचर रजिस्टर्ड नहीं है। रिटर्न भरने पर इसका एक्नॉलेजमेंट कैसे मिलेगा ?
सुभाष लखोटिया: मस्कट से भी ऑनलाइन रिटर्न आसानी से भरा जा सकता है। रिटर्न भरने के लिए सरकारी वेबसाइट incometaxindia.gov.in या incometaxindiaefilling.gov.in पर लॉगिन करके रिटर्न फॉर्म-2 भरा जा सकता है। रिटर्न भरने की प्रक्रिया खत्म होने पर आईटीआर वी की कॉपी मिलेगी। आईटीआर वी कॉपी बंगलुरू के इनकम कार्यलय में भेज दें। वहीं डिजिटल सिग्नेचर के तहत रिटर्न भरते हैं तो आईटीआर वी की कॉपी बंगलुरू भेजने की आवश्यकता नहीं होती।
सवाल: मेरी पत्नी को ट्यूशन क्लासेस से इनकम होती है। इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने के लिए आईटीआर फार्म भरना है, क्या फार्म के साथ बैलेंस शीट लगाना जरूरी है ?
सुभाष लखोटिया: ट्यूशन से यदि आय होती है तो आईटीआर फार्म-4 भरना होता है। वहीं इस तरह की आय में रिटर्न फार्म के साथ बैलेंस शीट लगाने की जरूरत नहीं होती है। फार्म में ही आय ब्यौरा देना होता है। बिजनेस फर्म या प्रोफेशनल व्यक्ति को बैलेंस शीट तैयार करनी होती है।
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9 जुलाई 2011
सीएनबीसी आवाज़
सीएनबीसी आवाज़
टैक्स गुरू सुभाष लखोटिया के मुताबिक किसी व्यक्ति के पास एक से ज्यादा बैंक अकाउंट हों तो भी आयकर रिटर्न फाइल करते समय सारे अकाउंट की जानकारी देना जरूरी नहीं है। जिस खाते का उपयोग वर्तमान में कर रहे हैं उसकी जानकारी देना काफी है।
अगर आपने पुरानी प्रॉपर्टी बेचकर पत्नी के नाम पर नई प्रॉपर्टी में निवेश कर दिया है तो इसके जरिए आप कैपिटल गेन टैक्स का फायदा नहीं उठा सकते हैं।
अगर आप कैपिटल गेन टैक्स का फायदा उठाना चाहते हैं तो नया मकान उसी व्यक्ति के नाम में होना चाहिए जिसने पुरानी प्रॉपर्टी बेची है।
टैक्स बचाने के लिए पुरानी प्रॉपर्टी बेचकर नई प्रॉपर्टी में निवेश करने के लिए बनाबनाया फ्लैट खरीदने के लिए 2 साल का वक्त मिलेगा जबकि जमीन खरीदकर मकान बनाने की सूरत में 3 साल का समय मिलेगा। इससे ज्यादा समय लगने पर आप कैपिटल गेन टैक्स का फायदा नहीं उठा पाएंगे।
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2 जुलाई 2011
सीएनबीसी आवाज़
सीएनबीसी आवाज़
टैक्स गुरू सुभाष लखोटिया दे रहे हैं इनकम टैक्स पर सलाह।
सवाल: मेरी इनकम टैक्स के दायरे में नहीं आती है। क्या नये सहज फॉर्म-1 का इस्तेमाल साल 2010-11 का रिटर्न भरने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं ?
सुभाष लखोटिया: साल 2010-11 की रिटर्न के लिए सहज फॉर्म-1 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। नये सहज फॉर्म-1 से साल 2011-12 का रिटर्न भर सकते हैं। बीते साल का रिटर्न फाइल करने के लिए सरल फॉर्म-2 का इस्तेमाल करें। वहीं आय टैक्स छूट सीमा से कम होने पर रिटर्न भरना जरूरी नहीं होता।
सवाल: मेरी सालाना इनकम 5 लाख रुपये है। क्या इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करना पड़ेगा ?
सुभाष लखोटिया: 31 मार्च 2011 को खत्म हुए साल में इनकम 5 लाख रुपये सालाना है तो इनकम टैक्स भरना जरूरी है। 80 साल या उससे ऊपर की आय वालों को ऐसे मामलों में छूट दी गई है। वहीं एम्पलॉयर की ओर से दिया गया टीडीसी सर्टिफिकेट भी रिटर्न माना जा सकता है।
सवाल: मैं घर में 11-12 क्लास के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हूं। टैक्स भरने लिए कौन सा आईटीआर फॉर्म भरना होगा ?
सुभाष लखोटिया: ट्यूशन से होने वाली इनकम यदि प्रोफेशनल इनकम है तो आईटीआर 1 फॉर्म भरें। वहीं ट्यूशन में इनकम दूसरे स्त्रोतों के द्वारा आती है तो आईटीआर 4 फॉर्म भरना पड़ता है।
सवाल: साल 2008-09 में कंपनी ने टीडीएस काटकर सर्टिफिकेट दिया जिसके बाद मैंने रिटर्न भी भरा, लेकिन अब तक रिफंड नहीं मिला क्या करें ?
सुभाष लखोटिया: रिटर्न भरने के बाद इनकम टैक्स विभाग से रिफंड मिलना चाहिए। इनकम टैक्स विभाग को टैक्स भरी हुई रसीद सबूत के तौर पर पेश करें। समाधान नहीं होने पर आयकर अधिकारी के पास इसकी शिकायत करें।
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28 मई 2011
सीएनबीसी आवाज़
टैक्स गुरु सुभाष लखोटिया सुलझाएंगे पाठकों की आयकर से जुड़ी परेशानियां
आयकर रिटर्न के नए नियम
1 जून 2011 से आयकर रिटर्न के नए नियम लागू होने वाले हैं। इसके तहत 5 लाख रुपये से कम सालाना आमदनी वाले कर्मचारियों को आयकर रिटर्न भरने की जरुरत नहीं होगी।
इस नियम के फायदा तभी मिलेगा जब कर्मचारी अपनी अन्य आय पर भी एम्पलॉयर से टीडीएस कटवाए। साथ ही, वेतन और अन्य आय 5 लाख रुपये से कम होनी चाहिए।
घर खरीदने के दौरान टैक्स बचत
पति-पत्नी एक साथ मिलकर घर खरीदते हैं तो इस पर दोनों ही टैक्स छूट का फायदा उठा सकते हैं। पति-पत्नी होम लोन के ब्याज पर अलग-अलग 1.5-1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट का फायदा ले सकते हैं।
इसके अलावा अगर आपने घर खरीदने के लिए बैंक के बजाए पिता से कर्ज लिया है तो इस पर भी टीडीएस नहीं कटेगा और आप टैक्स बचत के रूप में कुछ और रकम बचा सकते हैं।
कंपनी से मिले शेयर पर कैसे बचाएं टैक्स
अगर कर्मचारियों को कंपनी से डिस्काउंट भाव पर शेयर मिलते हैं तो आयकर सेक्शन 17(2) के प्रावधान के तहत टैक्स देना होगा। जिस भाव पर कंपनी से शेयर मिले और एलॉटमेंट के वक्त शेयर का बाजार भाव के अंतर पर टैक्स छूट का भुगतान करना होगा।
पति/पत्नी की मृत्यु होने की सूरत में कंपनी से मिलने वाले 10 लाख रुपये तक की ग्रेच्यूटी पर टैक्स छूट मिलेगी। पीपीएफ, ईपीएफ के तहत मिलने वाली आय पूरी तरह टैक्स मुक्त होगी। हालांकि लीव एन्कैशमेंट के तहत मिलने वाली 3 लाख रुपये तक की पूंजी पर ही टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं । 3 लाख रुपये से ज्यादा लीव एन्कैशमेंट की पूंजी पर टैक्स देनदारी बनेगी।
सीएनबीसी आवाज़
टैक्स गुरु सुभाष लखोटिया सुलझाएंगे पाठकों की आयकर से जुड़ी परेशानियां
आयकर रिटर्न के नए नियम
1 जून 2011 से आयकर रिटर्न के नए नियम लागू होने वाले हैं। इसके तहत 5 लाख रुपये से कम सालाना आमदनी वाले कर्मचारियों को आयकर रिटर्न भरने की जरुरत नहीं होगी।
इस नियम के फायदा तभी मिलेगा जब कर्मचारी अपनी अन्य आय पर भी एम्पलॉयर से टीडीएस कटवाए। साथ ही, वेतन और अन्य आय 5 लाख रुपये से कम होनी चाहिए।
घर खरीदने के दौरान टैक्स बचत
पति-पत्नी एक साथ मिलकर घर खरीदते हैं तो इस पर दोनों ही टैक्स छूट का फायदा उठा सकते हैं। पति-पत्नी होम लोन के ब्याज पर अलग-अलग 1.5-1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट का फायदा ले सकते हैं।
इसके अलावा अगर आपने घर खरीदने के लिए बैंक के बजाए पिता से कर्ज लिया है तो इस पर भी टीडीएस नहीं कटेगा और आप टैक्स बचत के रूप में कुछ और रकम बचा सकते हैं।
कंपनी से मिले शेयर पर कैसे बचाएं टैक्स
अगर कर्मचारियों को कंपनी से डिस्काउंट भाव पर शेयर मिलते हैं तो आयकर सेक्शन 17(2) के प्रावधान के तहत टैक्स देना होगा। जिस भाव पर कंपनी से शेयर मिले और एलॉटमेंट के वक्त शेयर का बाजार भाव के अंतर पर टैक्स छूट का भुगतान करना होगा।
पति/पत्नी की मृत्यु होने की सूरत में कंपनी से मिलने वाले 10 लाख रुपये तक की ग्रेच्यूटी पर टैक्स छूट मिलेगी। पीपीएफ, ईपीएफ के तहत मिलने वाली आय पूरी तरह टैक्स मुक्त होगी। हालांकि लीव एन्कैशमेंट के तहत मिलने वाली 3 लाख रुपये तक की पूंजी पर ही टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं । 3 लाख रुपये से ज्यादा लीव एन्कैशमेंट की पूंजी पर टैक्स देनदारी बनेगी।
एचयूएफ के लिए पार्टनरशिप नियम
सुभाष लखोटिया के मुताबिक 3 एचयूएफ मिलकर पार्टनरशिप फर्म बना सकते हैं और एक बिजनेस पार्टनरशिप डीड भी संचालित कर सकते हैं। इसके लिए ज्वाइंट फॉर्म में एक इंडीविजुअल को कर्ता बनाएं और उसके जरिए एचयूएफ फर्म में पार्टनरशिप लें। बिना कर्ता के एचयूएफ पार्टनरशिप फर्म में पार्टनर नहीं बन सकते हैं।
डीमैट अकाउंट और ट्रेडिंग अकाउंट अलग-अलग
पति-पत्नी को अपने डीमैट अकाउंट और शेयर ट्रेडिंग अकाउंट अलग अलग रखने होंगे। ऐसा ना करने पर क्लबिंग ऑफ इंकम का मामला हो सकता है और पति-पत्नी की आय एक दूसरे की आय में जोड़ी जा सकती है।
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11 जून 2011
सीएनबीसी आवाज़
सीएनबीसी आवाज़
लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस पर टैक्स बचत
टैक्स गुरु सुभाष लखोटिया के मुताबिक लंबे समय तक नॉन लिस्टेड कंपनियों का लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस 8 सालों के लिए कैरी फॉर्वर्ड किया जा सकता है। इसके अलावा लिस्टेड नॉन लिस्टेड शेयरों को बेचने पर होने वाले शॉर्ट टर्म कैपिटल लॉस को भी 8 सालों के लिए कैरी फॉर्वर्ड किया जा सकता है।
1 साल से ज्यादा लंबे समय तक शेयरों के रखने पर होने वाले फायदे को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन कहते हैं। 1 साल से ज्यादा शेयर बेचने पर मिलने वाले लाभ को लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस कहा जाता है। वहीं 1 साल से कम में शेयरों के बेचने पर मिलने वाले मुनाफे-घाटे को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन-लॉस कहा जा सकता है।
कैश उपहार पर टैक्स बचाने की टिप्स
अगर कोई पुत्र अपने पिता से कर्ज लेता है और इस कर्ज पर पिता को ब्याज देता है तो बेटा इस राशि पर टैक्स में छूट का फायदा उठा सकता है। वहीं पिता को बेटे को दिए गए कर्ज पर मिलने वाले मिलने वाले ब्याज पर टैक्स चुकाना होगा।
टैक्स गुरु के मुताबिक शादी पर मिलने वाले उपहारों पर टैक्स नहीं लगता है। शादी पर मिलने वाले गहनों, कैश पर टैक्स देनदारी नहीं बनती है।
हालांकि एक बात का ख्याल रखना चाहिए कि शादी की सालगिरह पर मिलने वाले 50,000 रुपये तक के उपहारों पर ही टैक्स छूट का फायदा मिल सकता है। 50,000 रुपये से ज्यादा के कैश उपहार, गहनों पर टैक्स देना होगा।
अगर कोई महिला पिता से उपहारस्वरूप मिली पूंजी को शेयर और कमोडिटी में लगाती है और इस पर सालाना मुनाफा 1,90,000 रुपये से कम होता है तो आपको इस पर किसी तरह का टैक्स नहीं देना होगा। शेयर, कमोडिटी ट्रेडिंग से 1,90,000 रुपये से ज्यादा की कमाई पर महिला टैक्स देनदारी के दायरे में आ जाएगी।
जमीन बेचने पर कैसे बचाएं टैक्स-
ग्रामीण इलाकों में कृषि भूमि बेचने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल टैक्स की देनदारी नहीं बनती बशर्ते आपको पूरी रकम चेक के जरिए मिली हो। वहीं शहरी इलाकों में कृषि योग्य भूमि बेचने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल टैक्स देना पड़ता है।
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कब फाइल करना होगा इनकम टैक्स रिटर्न!
18 जून 2011
hindimoneycontrol.com
रिटर्न फाइल करने का भार कम करने के उद्देश्य से कर निर्धारण वर्ष 2011-12 से एन्युअल इन्फॉरमेंशन रिपोर्ट (एआईआर) के अंतर्गत आने वाले व्यवहारों के लिए इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है।
इसका लाभ उन लाखों लोगों को मिलेगा, जिनकी आय बेसिक एक्जेम्पशन लिमिट से कम है, परंतु उन्हें एआईआर के दायरे में आने के कारण रिटर्न फाइल करना अनिवार्य होता था। कर निर्धारण वर्ष 2011-12 के सभी रिटर्न फार्म में से एमआईआर के तहत मांगी जाने वाली जानकारियों को हटा दिया गया है।
कर निर्धारण वर्ष 2010-11 तक व्यक्ति की आय बेसिक एक्जेम्पशन से अधिक नहीं होने पर भी एआईआर के अंतर्गत आने वाले निम्न व्यवहारों के लिए रिटर्न फाइल करना अनिवार्य होता था
*बैंकिंग रेग्यूलेशन एक्ट 1949 (10 ऑफ 1949), जिसमें कोई भी बैंक या बैंकिंग संस्था (जो इस एक्ट की धारा 51 के तहत हो) के बचत खाते में वित्तीय वर्ष में दस लाख रुपए या अधिक राशि जमा करने की स्थिति में।
*वित्तीय वर्ष में क्रेडिट कार्ड के बिल के तहत दो लाख रुपये या अधिक का भुगतान करने की स्थिति में।
*वित्तीय वर्ष में दो लाख रुपये या उससे अधिक के म्युचुअल फंड की खरीदी के भुगतान की स्थिति में।
*वित्तीय वर्ष एक लाख रुपये या उससे अधिक कंपनी के शेयरों की खरीदी के भुगतान की स्थिति में।
*वित्तीय वर्ष में किसी कंपनी या संस्था के पांच लाख रुपये या उससे अधिक के बांड या डिबेंचर की खरीदी के भुगतान की स्थिति में।
*तीन लाख रुपये या इससे अधिक की किसी प्रॉपर्टी की खरीदी की स्थिति में।
*तीन लाख रुपये या इससे अधिक की किसी प्रॉपर्टी की विक्रय की स्थिति में।
*रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए बांड पांच लाख रुपये या इससे अधिक की खरीदी के भुगतान की स्थिति में।
एआईआर के अंतर्गत आने वाले व्यवहारों के लिए इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की अनिवार्यता समाप्त करने के बाद व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाताओं को निम्न परिस्थितियों में रिटर्न फाइल करना अनिवार्य है-
*बेसिक एक्जेम्पशन से अधिक आय पर- व्यक्तिगत/एचयूएफ करदाता, जिनकी आय बेसिक एक्जेम्पशन लिमिट से अधिक हो तो उन्हें रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य होता है। बेसिक एक्जेम्पशन से अधिक आय की गणना में धारा 10 ए, 10 बी, 10 बीए और धारा 80 सी-80 यू तक की छूट नहीं घटाई जाती है। वित्तीय वर्ष 2010-11 कर निर्धारण वर्ष 2011-12 में व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाताओं के लिए बेसिक एक्जेम्पशन निम्न प्रकार है-
पुरुष करदाता : (65 वर्ष से कम) रुपये 1,60,000
महिला करदाता : (65 वर्ष से कम) रुपये 1,90,000
सीनियर सिटीजन : (65 वर्ष से अधिक) रुपये 2,40,000
एचयूएफ : रुपये 1,60,000
*हानि को आगामी वर्षों में समायोजन किए जाने की स्थिति में- वैसे तो व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाता के लिए हानि की दशा में रिटर्न फाइल करना अनिवार्य नहीं होता है, परंतु यदि हानि को आगामी वर्षों में समायोजन किया जाना हो तो रिटर्न नियत तिथि या इसके पूर्व फाइल किया जाना अनिवार्य है अन्यथा हानि का समायोजन आगामी वर्षों में नहीं किया जा सकेगा।
*विशिष्ट धाराओं के तहत छूट प्राप्त करने की दशा में- यदि धारा 10 ए, 10 बी, 80 आईए, 80 आईएबी, 80 आईबी और 80 आईसी के तहत छूट प्राप्त की जाना हो तो रिटर्न नियत तिथि के पूर्व फाइल करना अनिवार्य है अन्यथा उक्त धाराओं के तहत छूट प्राप्त नहीं की जा सकेगी।
*रिफंड क्लेम करने की दशा में- यदि आपकी डीडीए कटौती हुई है एवं आपका टैक्स रिफंड लेना निकलता है तो रिफंड क्लेम करने के लिए भी रिटर्न फाइल करना अनिवार्य है।
रिटर्न फाइल करने की नियत तिथि : व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाता, जो ऑडिट की श्रेणी में नहीं आते हैं, के लिए रिटर्न फाइल करने की नियत तिथि 31 जुलाई है एवं जो ऑडिट के दायरे में आते हैं, वे अपना रिटर्न 30 सितंबर तक फाइल कर सकते हैं।
व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाता को कब करना होगा ऑडिट : कर निर्धारण वर्ष 2011-12 से व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाताओं को वित्तीय वर्ष 2010-11 में रुपए 60 लाख से अधिक टर्न ओवर करने की दशा में या प्रोफेशन से रुपए 15 लाख से अधिक सकल प्राप्ति की दशा में अपने खाते अनिवार्य रूप से ऑडिट कराने होंगे।
यह लेख अरिहंत कैपिटल मार्केट के चीफ फाइनेंशियल प्लानर उमेश राठी ने लिखा है। umesh.rathi@arihantcapital.com पर उमेश राठी से संपर्क किया जा सकता है।
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टीआरपी से भी करा सकते हैं रिटर्न फाइल
23 जुलाई 2011
सीएनबीसी आवाज
सीबीडीटी ने व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाताओं के रिटर्न फाइल करने की लागत कम करने एवं प्रक्रिया को आसान बनाने के उद्देश्य से 28 नवंबर 2006 को अधिसूचना जारी कर 1 दिसंबर 2006 से टैक्स रिटर्न प्रिपेरर्स स्कीम 2006 की शुरुआत की है। इस स्कीम के लागू होने के बाद कुछ अपवादों को छोड़कर व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाता सर्टिफाइड टैक्स रिटर्न प्रिपेरर्स (टीआरपी) से अधिकतम 250रुपए का शुल्क अदा कर अपना रिटर्न फाइल करवा सकते हैं। इस स्कीम की विस्तृत जानकारी इस प्रकार है :-
सीबीडीटी ने व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाताओं के रिटर्न फाइल करने की लागत कम करने एवं प्रक्रिया को आसान बनाने के उद्देश्य से 28 नवंबर 2006 को अधिसूचना जारी कर 1 दिसंबर 2006 से टैक्स रिटर्न प्रिपेरर्स स्कीम 2006 की शुरुआत की है। इस स्कीम के लागू होने के बाद कुछ अपवादों को छोड़कर व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाता सर्टिफाइड टैक्स रिटर्न प्रिपेरर्स (टीआरपी) से अधिकतम 250रुपए का शुल्क अदा कर अपना रिटर्न फाइल करवा सकते हैं। इस स्कीम की विस्तृत जानकारी इस प्रकार है :-
कौन ले सकता है इस स्कीम का लाभ : व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाता (जिन्हें इस स्कीम मेंएलिजिबल पर्सन कहा गया है) टैक्स रिटर्न प्रिपेरर्स स्कीम 2006 का लाभ ले सकते हैं। इसके कुछ अपवाद हैं, जो निम्न प्रकार हैं :
(1) यदि व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाता ऑडिट की श्रेणी में आते हों।
(2) यदि वित्त वर्ष में व्यक्ति भारत में निवासी नहीं रहा हो।
(3) यदि व्यक्तिगत या एचयूएफ करदाता अपना रिवाइज रिटर्न फाइल कर रहे हों और उन्होंने अपना मूल रिटर्न सर्टिफाइड टैक्स रिटर्न प्रिपेरर्स से दाखिल नहीं करवाया हो।
(4) यदि व्यक्तिगत एवं एचयूएफ करदाता को धारा 142 (1) (i) या धारा 148 या धारा 153 (छ) के नोटिस के तहत रिटर्न फाइल करना हो।
कितना शुल्क अदा करना होगा : शुल्क की गणना करने के उद्देश्य से करदाता को नए एवं पुराने करदाता की दो श्रेणी में बांटा गया है।
(अ) नए करदाता : वह करदाता जो अपना पहला, दूसरा या तीसरा रिटर्न फाइल कर रहे हैं, वे नए करदाता की श्रेणी में आएंगे। इनके लिए शुल्क की गणना निम्न प्रकार होगी :
(1) पहला रिटर्न दाखिल करने पर : यदि एलिजिबल पर्सन अपना पहला रिटर्न दाखिल कर रहा है तो उसे 250 रुपए में से चुकाए गए टैक्स की राशि का 3% घटा देने के बाद शेष राशि शुल्क के रूप में अदा करनी होगी एवं यदि टैक्स पर 3% की राशि 250 रुपए से अधिक है तो कोई शुल्क अदा नहीं करना होगा।
(2) दूसरा रिटर्न दाखिल करने पर : यदि एलिजिबल पर्सन अपना दूसरा रिटर्न दाखिल कर रहा है तो उसे 250 रुपए में से चुकाए गए टैक्स की राशि का 2% घटा देने के बाद शेष राशि शुल्क के रूप में अदा करनी होगी एवं यदि टैक्स पर 2% की 250 रुपए से अधिक है तो कोई शुल्क अदा नहीं करना होगा।
(3) तीसरा रिटर्न दाखिल करने पर : यदि एलिजिबल पर्सन अपना तीसरा रिटर्न दाखिल कर रहा है तो उसे 250 रुपए में से चुकाए गए टैक्स की राशि में से 1% घटा देने के बाद शेष राशि अदा करनी होगी एवं यदि टैक्स पर 1% की राशि 250 रुपए से अधिक है तो कोई शुल्क अदा नहीं करना होगा।
(ब) पुराने करदाता : वह करदाता जो पूर्व में 3 या अधिक रिटर्न दाखिल कर चुके हैं, को अपना रिटर्न सर्टिफाइड टैक्स रिटर्न प्रिपेरर्स से दाखिल करवाने की दशा में 250 रुपए अदा करने होंगे।
ध्यान रखने योग्य बातें :
(1) यह सुनिश्चित कर लें कि इस स्कीम के तहत आपको रिटर्न फाइल करने की पात्रता है।
(2) रिटर्न पर हस्ताक्षर करने के पूर्व रिटर्न में दाखिल जानकारी की जांच कर लें।
(3) टैक्स रिटर्न प्रिपेरर्स से अदा किए गए शुल्क की रसीद अवश्य लें।
(4) रिटर्न फाइल होने के उपरांत रिटर्न की एक कॉपी अपने रिकॉर्ड के लिए अवश्य लें।
कहां से प्राप्त करें अपने नजदीकी टीआरपी की जानकारी : आप अपने नजदीकी सर्टिफाइड टैक्स रिटर्न प्रिपेरर्स (टीआरपी) की जानकारी www.trpscheme.com से प्राप्त कर सकते हैं।
स्कीम के संबंध में अधिक जानकारी : इस स्कीम के संबंध में अधिक जानकारीwww.trpscheme.com या टोल फ्री नंबर 1800-10-23738 से भी प्राप्त की जा सकती है।
यह लेख अरिहंत कैपिटल मार्केट के चीफ फाइनेंशियल प्लानर उमेश राठी ने लिखा है।umesh.rathi@arihantcapital.com पर उमेश राठी से संपर्क किया जा सकता है
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कैसे करें आयकर रिटर्न दाखिल करने की तैयारी
16 जुलाई 2011hindi.moneycontrol.com
यदि आप अभी तक अपने आयकर रिटर्न दाखिल करने संबंधी दस्तावेज एवं जानकारी नहीं जुटा पाएं हैं तो अपने व्यस्त समय में से कुछ समय निकालकर निम्न जानकारी तुरंत जुटा लें।
व्यक्तिगत करदाता जो ऑडिट की श्रेणी में नहीं आते हैं के लिए आयकर रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तिथि 31 जुलाई निर्धारित है। 31 जुलाई में मात्र कुछ ही दिन शेष रह गए हैं एवं यदि आप अभी तक अपने आयकर रिटर्न दाखिल करने संबंधी दस्तावेज एवं जानकारी नहीं जुटा पाएं हैं तो अपने व्यस्त समय में से कुछ समय निकालकर निम्न जानकारी तुरंत जुटा लें।
1. विभिन्न मदों से प्राप्त आय/ लाभ/ हानि की गणना : सर्वप्रथम वित्तीय वर्ष 2010-11 में अर्जित विभिन्न मद जिसमें सेलेरी, हाउस प्रापर्टी, प्रॉफिट एंड गेन ऑफ बिजनेस या प्रोफेशन, केपिटल गेन, अन्य स्रोत आदि से प्राप्त आय/ लाभ/ हानि की गणना कर लें। उक्त मदों से अर्जित आय की गणना करते समय निम्न जानकारी आवश्यक रूप से जुटा लें।
(ए) फार्म 16 : यदि आप नौकरी-पेशा हैं तो अपने नियोक्ता से फार्म नं. 16 ले लें। फार्म नंबर 16 में सेलेरी मद से हुई आय का समावेश होता है एवं यदि नियोक्ता ने आपकी टीडीएस कटौती की है तो वह भी इसमें शामिल होती है।
(बी) ब्याज का सर्टिफिकेट : यदि आपने होम लोन ले रखा है तो बैंक से वित्तीय वर्ष में चुकाए गए ब्याज का सर्टिफिकेट प्राप्त कर लें, जिसकी छूट धारा 24(बी) के तहत प्राप्त की जा सकती है।
(सी) केपिटल गेन : यदि आपने धारा 54, 54-बी, 54-डी, 54-ईसी, 54-एफ, 54-जी एवं 54-जीए के तहत केपिटल गेन बचत के लिए निवेश किया है तो उसकी भी जानकारी जुटा लें।
(डी) अन्य स्रोत : फिक्स्ड डिपॉजिट, एनएससी, केवीपी, डिविडेंड, रेस हार्स आदि से प्राप्त आय की जानकारी भी जुटा लें। साथ ही यदि अवयस्क बच्चों की भी कोई आय है तो उसे माता-पिता में से जिसकी आय अधिक हो उसमें जोड़ें।
2. धारा 80-सी से 80-यू के तहत प्राप्त छूट :
(ए) धारा 80-सी, 80-सीसीसी एवं 80-सीसीडी के तहत छूट : आयकर अधिनियम की धारा 80-सी, 80-सीसीसी के तहत व्यक्तिगत करदाता एक लाख रुपए तक का अनुमोदित निवेश/ अंशदान/ खर्च/ हाउसिंग लोन रिपेमेंट आदि की छूट प्राप्त कर सकते हैं। यदि वित्तीय वर्ष में आपने ईपीएफ/ पीपीएफ में अंशदान, एनएससी, टैक्स सेविंग एफडी, टैक्स सेविंग बॉण्ड,इंश्योरेंस प्रीमियम, ईएलएसएस या यूलिप आदि में निवेश किया है तो इससे संबंधित दस्तावेज एवं जानकारी जुटा लें। साथ ही यदि आपने वित्तीय वर्ष के दौरान बच्चों की पूर्णकालिक एजुकेशन की ट्यूशन फीस एवं किसी हाउस प्रॉपर्टी की खरीदी की गई हो तो उस पर चुकाए गए स्टाम्प शुल्क एवं पंजीयन शुल्क की भी जानकारी जुटा लें।
(बी) धारा 80 : सीसीएफ के तहत छूट- यदि आपने धारा 80-सीसीएफ के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर बांड में निवेश किया है तो उसकी भी जानकारी जुटा लें।
(सी) धारा 80-डी के तहत छूट : आयकर अधिनियम की धारा 80-डी के अंतर्गत स्वयं, पत्नी/ पति एवं बच्चों के मेडिक्लेम पॉलिसी की सालाना प्रीमियम या 15 हजार रुपए तक की आय में छूट प्राप्त की जा सकती है। साथ ही माता-पिता की मेडिक्लेम पॉलिसी की सालाना प्रीमियम या 15 हजार रुपए तक की भी अतिरिक्त छूट प्राप्त की जा सकती है। सीनियर सिटीजन होने की दशा में यह छूट 20 हजार रुपए तक प्राप्त की जा सकती है। यदि वित्तीय वर्ष में आपने उल्लेखित किसी भी पॉलिसी का प्रीमियम भुगतान किया है तो उसकी भी जानकारी जुटा लें।
(डी) धारा 80-ई के तहत छूट : आयकर अधिनियम की धारा 80-ई के तहत व्यक्तिगत करदाता, शिक्षा लोन पर चुकाए गए ब्याज की राशि की आय में से छूट प्राप्त कर सकते हैं। यदि आपने उल्लेखित ब्याज का भुगतान किया है तो उसकी भी जानकारी जुटा लें।
(ई) धारा 80-जी, 80-जीजीए, 80-जीजीसी : यदि आपने आयकर अधिनियम की धारा 80-जी, 80-जीजीए, 80-जीजीसी के तहत कोई दान दिया है तो उससे संबंधित दस्तावेज एवं जानकारी भी जुटा लें।
3. टीडीएस सर्टिफिकेट : कमीशन, ब्याज, किराए आदि पर यदि कोई टीडीएस कटौती हुई हो तो संबंधित व्यक्ति से उसका टीडीएस सर्टिफिकेट प्राप्त कर लें।
4. एडवांस टैक्स : यदि वित्तीय वर्ष में आपने कोई एडवांस टैक्स जमा किया है तो उसकी जानकारी भी एकत्र कर लें।
5. एक्जेम्ट इनकम : विभिन्न आय जैसे सिक्यूरिटी पर लांग टर्म केपिटल गेन, डिविडेंट, खेती की आय (पांच हजार रुपए से कम) आदि एक्जेम्ट इनकम की श्रेणी में आती है, परंतु इनकी जानकारी भी रिटर्न में देना होती है, अतः इससे संबंधित जानकारी भी आवश्यक रूप से एकत्र कर लें।
6. बैंक डिटेल : यदि आप टैक्स रिफंड के जरिए प्राप्त करना चाहते हैं तो बैंक की जानकारी के अलावा एमआयसीआर कोड भी सही रूप में भरा जाना आवश्यक होता है, अतः बैंक की संपूर्ण जानकारी के साथ एमआयसीआर कोड की भी जानकारी जुटा लें।
7. टैक्स की गणना : विभिन्न मदों से अर्जित आय/ लाभ/ हानि की गणना कर सकल आय निकाल लें। उसके बाद धारा80-सी से 80-यू तक की छूट घटाकर शुद्ध आय की गणना करें एवं टैक्स स्लेब अनुसार टैक्स की गणना कर 3 प्रतिशत की दर से टैक्स पर एजुकेशन सेस जोड़कर शुद्ध टैक्स निकाल लें। यदि आप स्वयं आय एवं टैक्स की गणना करने में सक्षम नहीं हैं तो कर सलाहकार/ सीए की मदद ले सकते हैं।
8. टैक्स डिपॉजिट : शुद्ध टैक्स की गणना करने के बाद टीडीए कटौती एवं एडवांस टैक्स का समायोजन करें एवं इसके बाद भी कोई टैक्स बाकी हो तो आयकर अधिनियम के प्रावधान के तहत बैलेंस टैक्स की राशि जमा करा दें।
यह लेख अरिहंत कैपिटल मार्केट के चीफ फाइनेंशियल प्लानर उमेश राठी ने लिखा है। umesh.rathi@arihantcapital.com पर उमेश राठी से संपर्क किया जा सकता है। ------------------------------------------------------------------------------
1. विभिन्न मदों से प्राप्त आय/ लाभ/ हानि की गणना : सर्वप्रथम वित्तीय वर्ष 2010-11 में अर्जित विभिन्न मद जिसमें सेलेरी, हाउस प्रापर्टी, प्रॉफिट एंड गेन ऑफ बिजनेस या प्रोफेशन, केपिटल गेन, अन्य स्रोत आदि से प्राप्त आय/ लाभ/ हानि की गणना कर लें। उक्त मदों से अर्जित आय की गणना करते समय निम्न जानकारी आवश्यक रूप से जुटा लें।
(ए) फार्म 16 : यदि आप नौकरी-पेशा हैं तो अपने नियोक्ता से फार्म नं. 16 ले लें। फार्म नंबर 16 में सेलेरी मद से हुई आय का समावेश होता है एवं यदि नियोक्ता ने आपकी टीडीएस कटौती की है तो वह भी इसमें शामिल होती है।
(बी) ब्याज का सर्टिफिकेट : यदि आपने होम लोन ले रखा है तो बैंक से वित्तीय वर्ष में चुकाए गए ब्याज का सर्टिफिकेट प्राप्त कर लें, जिसकी छूट धारा 24(बी) के तहत प्राप्त की जा सकती है।
(सी) केपिटल गेन : यदि आपने धारा 54, 54-बी, 54-डी, 54-ईसी, 54-एफ, 54-जी एवं 54-जीए के तहत केपिटल गेन बचत के लिए निवेश किया है तो उसकी भी जानकारी जुटा लें।
(डी) अन्य स्रोत : फिक्स्ड डिपॉजिट, एनएससी, केवीपी, डिविडेंड, रेस हार्स आदि से प्राप्त आय की जानकारी भी जुटा लें। साथ ही यदि अवयस्क बच्चों की भी कोई आय है तो उसे माता-पिता में से जिसकी आय अधिक हो उसमें जोड़ें।
(ए) धारा 80-सी, 80-सीसीसी एवं 80-सीसीडी के तहत छूट : आयकर अधिनियम की धारा 80-सी, 80-सीसीसी के तहत व्यक्तिगत करदाता एक लाख रुपए तक का अनुमोदित निवेश/ अंशदान/ खर्च/ हाउसिंग लोन रिपेमेंट आदि की छूट प्राप्त कर सकते हैं। यदि वित्तीय वर्ष में आपने ईपीएफ/ पीपीएफ में अंशदान, एनएससी, टैक्स सेविंग एफडी, टैक्स सेविंग बॉण्ड,इंश्योरेंस प्रीमियम, ईएलएसएस या यूलिप आदि में निवेश किया है तो इससे संबंधित दस्तावेज एवं जानकारी जुटा लें। साथ ही यदि आपने वित्तीय वर्ष के दौरान बच्चों की पूर्णकालिक एजुकेशन की ट्यूशन फीस एवं किसी हाउस प्रॉपर्टी की खरीदी की गई हो तो उस पर चुकाए गए स्टाम्प शुल्क एवं पंजीयन शुल्क की भी जानकारी जुटा लें।
5. एक्जेम्ट इनकम : विभिन्न आय जैसे सिक्यूरिटी पर लांग टर्म केपिटल गेन, डिविडेंट, खेती की आय (पांच हजार रुपए से कम) आदि एक्जेम्ट इनकम की श्रेणी में आती है, परंतु इनकी जानकारी भी रिटर्न में देना होती है, अतः इससे संबंधित जानकारी भी आवश्यक रूप से एकत्र कर लें।
क्या मृतक का भी रिटर्न फाइल करना होगा
9 जुलाई 2011
सीएनबीसी आवाज़
सीएनबीसी आवाज़
आयकर अधिनियम के प्रावधानों के तहत मृत की आय पर टैक्स अदा करने का दायित्व उसी प्रकार होता है, जिस प्रकार किसी जीवित व्यक्ति का दायित्व होता है। साथ ही, रिटर्न दाखिल करने संबंधी जो प्रावधान जीवित व्यक्ति पर लागू होते हैं, वही मृतक पर भी लागू होते हैं। बस फर्क इतना होता है कि जीवित व्यक्ति स्वयं/अधिकृत व्यक्ति द्वारा अपनी आय पर टैक्स अदा कर रिटर्न दाखिल करता है, परंतु मृतक की दशा में लीगल रिप्रेजेंटेटिव/निष्पादक को टैक्स अदा करने एवं रिटर्न दाखिल करने का दायित्व होता है।
लीगल रिप्रेजेंटेटिव/निष्पादक द्वारा मृतक की आय पर तब तक टैक्स चुकाने एवं रिटर्न दाखिल करने का दायित्व होता है, जब तक कि मृतक की संपत्ति पूर्ण रूप से वारिसों के मध्य विभाजित नहीं हो जाए अथवा मृतक की संपत्ति पर आय बंद न हो जाए।
मृतक का रिटर्न दाखिल करते समय उन सभी कटौतियों का लाभ ले सकते हैं, जो जीवित व्यक्ति पर लागू होती हैं।
लीगल रिप्रेजेंटेटिव/निष्पादक अपनी स्वयं की आय पर पृथक रूप से टैक्स अदा कर रिटर्न दाखिल कर सकता है।
आयकर अधिनियम की धारा १५९ एवं १६८ में विभिन्न परिस्थितियों में किस व्यक्ति का मृतक की आय पर टैक्स अदा कर रिटर्न दाखिल करने का दायित्व है, का उल्लेख किया गया है, वह निम्न प्रकार है-
* वसीयत निष्पादित नहीं होने की दशा में- आयकर अधिनियम की धारा १५९ के तहत यदि मृतक द्वारा वसीयत निष्पादित नहीं की गई है तो मृतक के लीगल रिप्रेजेंटेटिव को मृतक की आय पर टैक्स अदा करने एवं रिटर्न दाखिल करने का दायित्व होता है।
यदि मृतक का एक ही वारिस है तो वह लीगल रिप्रेंजेंटेटिव होगा, परंतु एक से अधिक वारिसों की स्थिति में सभी वारिसों के मध्य सहमति होकर एक को आयकर संबंधी कार्य के लिए लीगल रिप्रेजेंटेटिव नियुक्त किया जाएगा।
आयकर अधिनियम की धारा १६७ के तहत लीगल रिप्रेजेंटेटिव को अन्य वारिसों के हिस्से से उनके हिस्से के बराबर टैक्स की राशि वसूलने का अधिकार होगा।
* वसीयत निष्पादित होने की दशा में- आयकर अधिनियम की धारा १६८ के तहत यदि मृतक ने वसीयत निष्पादित कर निष्पादक की नियुक्ति की है तो निष्पादक को मृतक की आय पर टैक्स अदा करने एवं रिटर्न दाखिल करने का दायित्व होता है। साथ ही धारा १६९ एवं १६२ के तहत निष्पादक को अधिकार होता है कि मृतक की संपत्ति में से टैक्स की अदा की गई राशि वसूल कर सकता है।
अतः यदि आप किसी मृतक के लीगल रिप्रेजेंटेटिव अथवा निष्पादक की श्रेणी में आते हैं तो मृतक की आय पर अनिवार्य रूप से टैक्स अदा कर नियत तिथि के पूर्व आयकर रिटर्न दाखिल करें।
यह लेख अरिहंत कैपिटल मार्केट के चीफ फाइनेंशियल प्लानर उमेश राठी ने लिखा है।umesh.rathi@arihantcapital.com पर उमेश राठी से संपर्क किया जा सकता है।
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